ममता का संघीय ढांचे की आड़ में उसी पर वार

सम्पदिकीय :- क्रांति कुमार पाठक

पिछले दिनों कोलकाता में राज्य और केंद्र की एजेंसियों के बीच पैदा हुए अनावश्यक विवाद ने सारी हदें पार कर दी। इस विवाद ने केंद्र-राज्य संबंधों की भी नये सिरे से पड़ताल करने की अहमियत को उजागर कर दिया है। इस विवाद में जहां एक ओर सारदा और रोज वैली जैसी योजनाओं के नाम पर हुए घोटालों की बात की जा रही है तो,वहीं दूसरी ओर देश के संघीय ढांचे की भी बात हो रही है। लेकिन लोगों के लिए यह तय कर पाना मुश्किल हो गया है कि कौन एजेंसी बड़ा है, केंद्र सरकार की सीबीआई या पश्चिम बंगाल की राज्य पुलिस। इस एक घटना ने प्रशासनिक कौशल और राजनीतिक दूरदर्शिता, दोनों को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। इस स्थिति से बचा जा सकता था। लेकिन इस पूरे मामले में दोनों पक्षों ने गलत रवैया अपनाया। शायद ही किसी ने सोचा होगा कि राज्य पुलिस और सीबीआई इस हद तक जा सकती है।
दरअसल, ऐसे किसी भी जांच में अधिकारी स्तर के पुलिसकर्मी शामिल होते हैं। किसी भी तनाव के सूरत में उनमें आसानी से सामंजस्य भी स्थापित हो जाता है और जांच-प्रक्रिया पूरी कर ली जाती है। किंतु यहां ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया। अगर पश्चिम बंगाल के कनिष्ठ अधिकारियों में सहमति नहीं बन पा रही थी, तो राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों को सामने आना चाहिए था। इसी तरह सीबीआई प्रमुख राज्य के पुलिस महानिदेशक से बात करके जांच-प्रक्रिया की रणनीति बना सकते थे। ऐसा कुछ नहीं होने की वजह से ही आज पुलिस एक ऐसा औजार बनती दिख रही है,जिसकी सहायता से सियासी दल अपनी अपनी सियासत चमकाने में जुटे हुए हैं। पश्चिम बंगाल में जो हुआ है उसे आगामी लोकसभा चुनाव से जोड़कर न देखा जाए, यह हो नहीं सकता। यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले कुछ दिनों से भाजपा और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के बीच तनाव कुछ ज्यादा ही गहरा गया है। इस समय पश्चिम बंगाल उन राज्यों में से एक है, जिसके बारे में भाजपा को लगता है कि वहां एक बड़ी चुनावी जीत हासिल की जा सकती है। इसलिए उसने अपनी सक्रियता वहां तेजी से बढ़ाई है। दूसरी ओर ममता बनर्जी को भी भाजपा की कड़ी चुनौती महसूस होने लगी है।फलत वह भी उसे कड़ी टक्कर देने की ठान ली है। यही कारण है कि पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को रथयात्रा करने की अनुमति नहीं दी गई। फिर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का हेलीकाप्टर पश्चिम बंगाल में उतरने नहीं दिया गया। इसके बाद सीबीआई के 40 अधिकारी सारदा चिटफंड मामले की जांच करने कोलकाता के पुलिस आयुक्त के घर पहुंच गए। अब योगी आदित्यनाथ के हेलीकॉप्टर को उतरने की इजाजत न देना और सीबीआई अधिकारियों का पुलिस आयुक्त के घर पहुंचना,दोनों जुड़े हुए मामले हों या न हो, लेकिन जिस तरह की राजनीति चल रही है उसमें इन्हें जोड़कर देखा जाना ही था। उसके बाद सीबीआई अधिकारियों को पुलिस द्वारा पकड़ कर ले जाया जाना और उसके बाद सीबीआई कार्यालय को पुलिस द्वारा घेर लिया जाना, यह सब ऐसा घटनाक्रम था, जिसने दोनों ही दलों को अपनी अपनी राजनीति साधने का प्रर्याप्त अवसर उपलब्ध करा दिया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तुरंत धरने पर बैठ गई।सारा विपक्ष उनके समर्थन में आ गए। भाजपा नेताओं के तरकश में भी बहुत से तीर आ ग‌ए। खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी जनसभाओं में ममता बनर्जी और सारे विपक्ष पर इसी बहाने हमले करने शुरू कर दिए। जो कुछ अब तक हुआ, उससे यह प्रतीत भी हो रहा है कि सीबीआई पर केंद्र सरकार का दबाव है और राज्य पुलिस पर राज्य सरकार का। पर इस पूरे विवाद से किसी को लाभ मिलता हुआ नहीं दिख रहा है। लेकिन इससे पुलिस विभाग की छवि अवश्य खराब हो रही है।
बहरहाल, हमारे देश में एक नई प्रवृत्ति उभरी है कि पुलिस और सरकारी जांच एजेंसियां अब जनता में अपनी साख और विश्वसनीयता को लेकर तनिक भी गंभीर नहीं दिखतीं, जबकि यह उनकी बुनियादी चिंता होनी चाहिए थी। एक लोकतांत्रिक देश में उसकी संस्थाओं की विश्वसनीयता और ईमानदारी उसकी श्रेष्ठता की कसौटी होती है।
बहरहाल, क्या किसी घोटाले की जांच में जानबूझकर गड़बड़ी करने वाले अधिकारी से पूछताछ करने से लोकतंत्र, संविधान और संघीय ढांचा खतरे में पड़ जाता है? पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का तो यही मानना था, लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत उनसे सहमत नहीं हुआ और कहा कि सीबीआई कोलकाता के पुलिस आयुक्त से पूछताछ करेगी। इसके साथ ही राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और पुलिस आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का नोटिस भी जारी कर दिया। इसके बावजूद ममता बनर्जी इसे अपनी नैतिक जीत मान रही हैं।क‌ई विपक्षी दल भी ममता के साथ खड़े हैं। पर किसी ने भी यह पूछने की जरूरत नहीं समझा कि आखिर ममता भ्रष्टाचार की जांच में गड़बड़ करने के आरोपी को क्यों बचाना चाहती हैं? इसके विपरित पूछताछ के लिए ग‌ई सीबीआई की टीम को हिरासत में लेकर थाना ले जाना और सीबीआई के संयुक्त निदेशक के कोलकाता स्थित घर को व सीबीआई दफ्तर को राज्य पुलिस द्वारा घेर लिया जाना विपक्षी दलों की नजरों में संविधान और संघीय ढांचे को बचाने वाला कदम है? दरअसल भारत की राजनीति एक बड़े बदलाव की दौर से गुजर रही है। जहां नेताओं का भ्रष्टाचार में लिप्त होना या भ्रष्टाचारियों का बचाव करना सामान्य सी बात होने लगी है।

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