हिमाचली नीति-नियमों का प्रदर्शन – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

हिमाचली तरक्की के आंकड़े कहीं प्रदेश के वजूद को गुनहगार बना रहे हैं या विकास के मुहानों ने खुद को जवाबदेह नहीं बनाया। क्या हिमाचल ने नीति-नियम निर्धारण में कोताही बरती या इनकी अनुपालना में पद्धति ही कमजोर रही। जो भी हो, लेकिन नीति-नियमों का प्रदर्शन बेहद कमजोर और अप्रभावशाली दिखाई देता है। इसलिए हम प्रशासनिक असफलता के चिन्हित मजमूनों का दोष वर्तमान सरकार पर नहीं डाल सकते। कुछ-कुछ धक्केशाही जैसा माहौल हिमाचल में बनने लगा है और इसीलिए सियासी प्रतिज्ञा में प्रशंसक बनने की दौड़ का प्रदर्शन सिद्धांतविहीन होता जा रहा है। सरकारों के बीच चारित्रिक निरंतरता का अभाव और सत्ता के साथ ही विकास का नक्शा बनाने की होड़ ने असंतुलन या संशय पैदा कर दिया। नीतियां-नियम इसलिए खोखले हो गए, क्योंकि हर सत्ता ने अपने करिश्मे में कार्यान्वयन की शर्तें भुला दीं। यही कड़वा सत्य अगर वर्तमान सरकार की चौखट पर खड़ा है, तो मालूम होता है कि राज्य के मसलों का निवारण किस असमंजस में फंसा है। उदाहरण के लिए जब स्थानांतरण जैसे विषय मुख्यमंत्री कार्यालय की माथापच्ची का सबब बनकर, फाइलों का अंबार लगा दें तो सरकारी कार्यसंस्कृति में फैले इस रोग की दवा क्या होगी। बेशक जयराम सरकार ने स्थानांतरण के पचड़ों में मुख्यमंत्री कार्यालय की जादुई छड़ी का बार-बार उपयोग एक तरह से बंद कर दिया, लेकिन नीति-नियम बनाने की दिशा में अभी अवरोधक खड़े हैं। शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज ने स्थानांतरण के कवच में बैठी गंदगी को मिटाने का आरंभिक संकल्प लिया, लेकिन अंजाम तक पहुंचाने की अड़चनें खत्म नहीं हुईं। कुछ दिन पहले स्वास्थ्य मंत्री विपिन परमार ने पालमपुर नगर निगम को सैद्धांतिक हरी झंडी दिखा दी, लेकिन ऐसे संस्थानों की स्थापना की नीति व नियम दिखाई नहीं देते। अगर नगर निगम बनाने हैं, तो मंडी, सोलन के औचित्य पर छाई खामोशी तक नीति व नियमों की गूंज पहुंचनी चाहिए। कुछ इसी तरह सरकारें बदलते ही फैसलों की भरमार में नए कालेज जन्म ले लेते हैं, लेकिन औचित्य की ढांक से गिरकर शिक्षा चकनाचूर हो जाती है। हमारी उड्डयन संभावनाओं की उड़ान हर बार सत्ता के चक्कर काटती है, लेकिन न भुंतर एयरपोर्ट और न ही जुब्बड़हट्टी की हवाई पट्टी का माकूल विस्तार हो पाया। हम करना क्या चाहते हैं, इस पर बहस के बजाय सत्ता की पैमाइश में एक अदद इंटरनेशनल एयरपोर्ट की ख्वाहिश हर बार मुमकिन को भी मृग तृष्णा बना देती है। बेहतर होता पूरे प्रदेश के नक्शे पर यह समझा जाए कि हिमाचल की चारों दिशाएं किस तरह एक-दूसरे की पूरक बनकर समन्वित विकास की पहरेदार बन सकती हैं। इसे नीतियों, कार्यक्रमों और नियमों की कसौटी पर ही न्यायपूर्ण बनाया जा सकता है, वरना हर अच्छा फैसला भी सियासी क्षेत्रवाद की अवधारण में गुम हो सकता है। प्रदेश की अधोसंरचना निर्माण को गति देने के लिए अब मापदंड, नीति और नियम एकदम स्पष्ट तथा पारदर्शी बनाने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि फोरलेन मुआवजे की तहों में आक्रोश, जबकि भू-अधिग्रहण के वर्तमान ढर्रे में विस्थापितों की आहें भर रही हैं। हर परियोजना के साथ पुनर्वास की व्यवस्था जब तक कायम नहीं होती, विकास के सिद्धांत पुख्ता नहीं होंगे। ऐसे में नीतियों-नियमों की जरूरत इसलिए अहम है, ताकि भविष्य को रेखांकित करने की इच्छाशक्ति किसी सियासी मोल-तोल में व्यर्थ न चली जाए।
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( साभार  :-  एजेन्सी / संवाददाता  / अन्य न्यूज़ पोर्टल  )

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