मोदी पर भारी गठबंधन! – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

इस समय देश में न तो मोदी लहर है और न ही विपक्षी दल किसी ठोस जमीन पर मौजूद हैं। फिर भी उपचुनावों के जनादेश महत्त्वपूर्ण हैं। हालांकि उन्हें प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ ‘चुनावी लहर’ या सार्वजनिक रुझान नहीं माना जा सकता। जो भी उपचुनाव हुए हैं, वे स्थानीय मुद्दों और समस्याओं पर आधारित रहे हैं। भाजपा ने महाराष्ट्र में पालघर लोकसभा सीट जीती है, नागालैंड में उसके सहयोगी दल एनडीपीपी ने जीत हासिल की है, लेकिन महाराष्ट्र में ही भंडारा गोंदिया संसदीय सीट एनसीपी ने भाजपा से छीनी है और उप्र में कैराना सीट पर विपक्ष के कथित गठजोड़ ने भाजपा को शिकस्त दी है। यह सीट भी भाजपा के पास थी। कैराना देश भर में विपक्ष के गठबंधन का फार्मूला बनेगा। उप्र इसलिए अहम है, क्योंकि वहां से 80 सांसद चुनकर लोकसभा में आते हैं। उप्र पर ही 2019 की चुनावी रणनीति टिकी है, यदि भाजपा औसतन 50 फीसदी वोट पाने का लक्ष्य हासिल करना चाहती है। उप्र में भाजपा की लगातार पराजय चिंतित संकेत है। बहरहाल मौजूदा उपचुनावों के नतीजों के बाद लोकसभा में भाजपा की 271 सीटें रह गई हैं। यानी 2014 के ऐतिहासिक जनादेश में क्षरण और पतन…! हालांकि भाजपा और एनडीए का लोकसभा में बहुमत पर्याप्त है। कैराना से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अपनी संसदीय सीट गोरखपुर और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की फूलपुर सीट पर भाजपा की पराजय साफ व्याख्या करती है कि प्रधानमंत्री मोदी बनाम विपक्षी गठबंधन अप्रत्याशित चुनावी समीकरण सामने ला सकते हैं। वे मोदी को चुनौती दे सकते हैं, लेकिन ऐसा कुछ ही राज्यों में संभव है। अभी तो दलों के नेताओं की महत्त्वाकांक्षाओं के टकराव सामने आने हैं, महागठबंधन को आकार लेना है, नेता का नाम तय होना है, लेकिन यह सवाल बेहद महत्त्वपूर्ण है कि आखिर उप्र में जनादेश लगातार ही भाजपा के खिलाफ क्यों है? उप्र में कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा सीट दोनों पर ही भाजपा हारी है। सवाल है कि क्या योगी सरकार पर उंगली उठाई जानी चाहिए? मुख्यमंत्री ने घोषणाएं खूब की हैं, काम भी किए होंगे, लेकिन जनता योगी सरकार से संतुष्ट क्यों नहीं है? अपराध और बदमाशों को खत्म करने का संदर्भ प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपने संबोधन में दिया था। उन्होंने मुख्यमंत्री को शाबाशी भी दी थी। गन्ने के भुगतान और किसानों पर भी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने खूब आश्वासन दिए, लेकिन लगता है कि जनता अब उनके आश्वासनों पर भरोसा करने को तैयार नहीं है। नतीजतन उपचुनाव के जनादेश सामने हैं। सीधी व्याख्या की जा सकती है कि उप्र में सिर्फ 14 महीनों के अंतराल में ही जनता का योगी सरकार के प्रति मोहभंग हो चुका है, नतीजतन 4 बड़ी चुनावी हारें भाजपा को झेलनी पड़ी हैं। यदि ये जनादेश कोई संकेत हैं, तो 2019 में आम चुनावों में भाजपा का गणित बिगड़ सकता है। हालांकि हम इन जनादेशों को स्थायी रुझान नहीं मान रहे हैं। 2014 के चुनाव के बाद 27 संसदीय उपचुनाव हो चुके हैं। उनमें से 16 सीटें एनडीए के पास थीं और 11 सीटें विपक्ष के पास थीं। राजग की 16 में से 13 पर भाजपा और 3 पर उसके सहयोगी दल काबिज थे। सहयोगी दलों ने दो सीटें बरकरार रखीं और एक सीट श्रीनगर गंवा दी, लेकिन भाजपा 13 में से मात्र 5 सीटें ही दोबारा जीत सकी, ये चिंतित परिणाम हैं। भाजपा के प्रति जनमत सिकुड़ता जा रहा है। अभी तो विपक्षी गठबंधन पूरी तरह बना भी नहीं है। कैराना में पहला प्रयोग किया गया था। कांग्रेस कह रही है कि वह कोई भी ‘कुर्बानी’ देने को तैयार है। यदि स्थितियां ऐसी ही रहीं, तो 2019 तक कमोबेश उप्र में भाजपा के समर्थन में समीकरण बदल सकते हैं। यदि समीकरण बदलते हैं, तो 2019 में भी बहुमत की कल्पना कैसे की जा सकती है? हालांकि यह तर्क गले नहीं उतरता कि उपचुनाव में भाजपा की पराजय होती है और आम चुनाव वह जीतती है। आखिर इसके कारण क्या हैं? इस साल के अंत में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी चुनाव होने हैं। पहले दो राज्यों में भाजपा बीते लंबे समय से सत्ता में है। जाहिर है कि कुछ सत्ता-विरोधी लहर भी चल रही होगी। राजस्थान में कोई भी पार्टी लगातार दोबारा सत्ता में नहीं आ पाई है। राजस्थान से तो सभी 25 लोकसभा सीटें 2014 में भाजपा की झोली में आई थीं। यदि विपक्षी लामबंदी के कारण इन राज्यों में भी भाजपा पिछड़ जाती है, तो 2019 के समीकरण क्या होंगे, सहज ही महसूस किया जा सकता है। बहरहाल भाजपा आंतरिक मंथन और समीक्षा तो करेगी ही, लेकिन मोदी-शाह को रणनीति में भी फेरबदल करना पड़ेगा।
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( साभार  :-  एजेन्सी / संवाददाता  / अन्य न्यूज़ पोर्टल  )

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