विष्णु पुराण – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

भवंतु पतःश्लाघ्य मम जन्मनि।
त्वत्सादात्तथा पुत्रः प्रजपतिसमोऽस्तु मे
कुल शीलं वयः सत्य दाक्षिण्य क्षिपकारिता।
अविसवादिता सत्व वृद्धसेवा कृतज्ञता।
ससम्पत्समायुक्ता सर्वस्य प्रियदर्शना।
अयोनिजा च वायेय त्वत्प्रसादादधोक्षज।
तयैववमुता देवेशो हृषीकेश उवाचताम्।
प्रणामनम्रामुत्थपारू वरदः परमेश्वरः।
यह अपने पूर्व जन्म में एक राजमहिर्षी थी। उसके पति पुत्रहीन अवस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो गए थे। तब इस महाभागा ने भगवान की भक्ति करके उन्हें प्रसन्न किया। उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए भगवान ने प्रकट होकर उससे वर मांगने को कहा, तब उसने अपनी इच्छा इस प्रकार प्रकट की। हे प्रभो! बाल विधवा होने के कारण मेरा जीवन व्यर्थ हो गया है। मैं इतनी अभागिनी रही कि संसार में फलहीन ही रह गई। इसलिए अब अगले जन्म में जो पति हो, वह अत्यंत प्रशंसनीय हो तथा प्रजापति के समान पुत्र भी हो। हे नाथ! मैं आप की कृपा से कुल, शील, वय, सत्य कोशल, शीघ्र कार्यत्व, अविसव, दत्य, सत्व, वृद्ध जनसेवा, कृतज्ञता, श्रेष्ठ रूप और ऐश्वर्य से संपन्न होऊं। मैं सबको प्रिय लगूं तथा मेरे जन्म योनि रहित हो। चंद्रमा ने कहा, उसके द्वारा ऐसा वर मांगे जाने पर प्रमाण के लिए झुकी हुई उस स्त्री को उठाते हुए वरदायक भगवान विष्णु ने उससे कहा।
भविष्यंति महावीर्या एकस्मिन्नेवजन्मनि।
प्रख्यातोदारकर्माणो भवत्याः पतयो दश।
पुत्रञ्च सुपहावीर्य महबलपराक्रमम।
प्रजापतिगुणैयुक्तं त्वमवाप्स्यसिशोभने।
वंशानां तस्य कर्तृत्य जगत्यस्मिंभविष्यति।
त्रैलोक्यमखिला सृर्स्तिस्य चापुरयिष्यति।
त्वं चाप्योनिजा साध्वी रूपौदार्येगुणान्विता।
ममः प्रीतिकारी नृणां वत्प्रसादाद भविष्यसि।
इच्दुत्वंतदधे देवास्तां विशांलविलोचनाम।
सा चेयं मारिषा जाता युष्मत्पत्नी नृपात्मजाः।
भगवान बोले, तेरे एक जन्म में ही अत्यंत पराक्रमी, कर्मवीर और प्रसिद्ध दस पति होंगे। तब तेरे प्रजापति के समान अत्यंत, बल, वीर्य, विक्रम युक्त एक पुत्र भी होगा। ब्रह्म पुत्र विश्व में अनेक वंशों को चलाएगा और उसकी संतान तीनों लोकों में जा बसेगी। मेरी कृपा से भी तू उदारता रूप गुण, शील आदि से संपन्न, सब का चित्त प्रसन्न करने वाली तथा अयोनिजा होगी। उस विशाल नेत्र वाली को इस प्रकार वर देकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए। तुम्हारी पत्नी मारिषा के रूप में यह वही राजा महर्षि है।
ततः सोमस्य वचनाज्जागृहुष्ते प्रचेतसः।
सहृत्य कोप वृक्षेभ्यः पत्नीधर्मेण मारिषाम्।।
दशभ्युस्तु प्रचेतोश्यो मारिषायां प्रजापतिः।
यज्ञैं दक्षो महाभागोस्णयः पर्व ब्रह्मणोऽभवत्।।
स तु दक्षो महाभागस्सृष्टयर्थ सुमहामते।
पुत्रानउत्पादयामास प्रजासृष्टयर्थमात्मनः।।
अचरांश्च चरांश्चैव द्विपदोऽथ चतुष्पदान।
आनेश ब्रह्मणः कुर्वन सृष्टयर्थ समुपस्थितः।।
स दृष्टवा मनसा दक्षः पश्चादसृत स्त्रियः।
ददौ स दश धर्माय कश्यषाय त्रयोदशः।।
कालस्य नयने युक्ताः सप्तविशतितिमन्दवे।
तासु देवास्तथा दैत्या नागा गावस्तथा खगाः।।
गंधर्वाप्सरश्चैव दानवाद्याश्च जज्ञिरे।
ततः प्रभृति मैत्रेय प्रजा मैथुनसम्भवाः।।
संकल्पाद्दर्शनात्स्पष त्पूर्वेषामभवन पूजाः।
तपोविशेषैः सिद्धानां तदात्यन्ततपस्विनाम्।।
श्री पराशर जी ने कहा, चंद्रमा के इस प्रकार कहने से प्रचेतागण शांत हुए और उन्होंने मारिषा को भार्या रूप में ग्रहण किया। दर्षों प्रचेताओं से उस मारिषा के दक्ष प्रजापति को जन्म दिया। ब्रह्माजी से उत्पन्न हुए थे। हे महामते! ब्रह्माजी की आज्ञा से उस दक्ष प्रजापति ने सर्ग रचना की इच्छा करके नीचे ऊंचे तथा विभिन्न प्रकार के देह धारियों को पुत्र रूप से उत्पन्न किया। पहिले उन्होंने मानसी सृष्टि रची, फिर स्त्रियां उत्पन्न करके मैथुनी सृष्टि की रचना की। उन्होंने अपनी दस कन्याएं धर्म के और तेरह कश्यप के साथ व्याह दीं। फिर काल परिवर्तन में नियुक्त हुई अश्विनी आदि सताईस कन्याएं चंद्रमा को दीं। इनसे देवता, दैत्य, नाग, गौ, पक्षी, गंधर्व अप्सरा और दानवादि की उत्पत्ति हुई। मैत्रेय जी! मैथुनी सृष्टि का आरंभ दक्ष काल से हुआ है।
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( साभार  :-  संवाददाता   /   एजेन्सी   /   अन्य न्यूज़ पोर्टल  )

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