आनंद के लिए वर्तमान में जीएं – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

गुरुओं, अवतारों, पैगंबरों, ऐतिहासिक पात्रों तथा कांगड़ा ब्राइड जैसे कलात्मक चित्रों के रचयिता सोभा सिंह पर लेखक डॉ. कुलवंत सिंह खोखर द्वारा लिखी किताब ‘सोल एंड प्रिंसिपल्स’ कई सामाजिक पहलुओं को उद्घाटित करती है। अंग्रेजी में लिखी इस किताब के अनुवाद क्रम में आज पेश हैं ‘सुमिरन’ पर उनके विचार :
-गतांक से आगे…
उनमें अधिकतर ठग, चोर व बेईमान लोग होते हैं। एक ईमानदार व सच्चे आध्यात्मिक व्यक्ति को अन्य लोगों की मदद उनके उभरने में करनी चाहिए। व्यक्ति का विकास प्राकृतिक रूप से होना चाहिए तथा किसी को अहम में आकर यह नहीं कहना चाहिए कि मेरे इतने दोस्त हैं, मैं इतने सारे क्लबों का सदस्य हूं, मेरी इतनी सारी सोसायटियां हैं इत्यादि। हो सकता है कि यह बहुत आसान न हो, किंतु फिर भी एक व्यक्ति को एक पेड़ की तरह पूर्वाग्रह से शून्य रहकर उभरना है। यह जानने के लिए कि ऐसा व्यक्ति सच में ही धोखेबाज नहीं है, हमें अपने प्रभाव का मूल्यांकन करना है तथा उसे परंपरागत रूप से देखकर ऐसा नहीं करना है। जब हम बात करते हैं तो हम भूतकाल व भविष्य अपने सामने रखते हैं। आनंद लेने के लिए हमें एक बच्चे की तरह वर्तमान में रहना है। एक बच्चा अगर भूखा है, तो वह बिना किसी हिचक के खाना मांगेगा। उधर एक वयस्क अगर भूखा भी है तो वह यह कहेगा कि नहीं, धन्यवाद, मुझे भूख नहीं है। वह वर्तमान में नहीं रहना चाहता है। अन्य लोग आपको कोई चीज दे सकते हैं, परंतु वे आपको मन की शांति नहीं दे सकते हैं।
आपको इसे अपने भीतर से प्राप्त करना होता है। समाज का हमारे दिमाग व व्यक्तित्व पर असर पड़ता है। सादे कपड़े आपको सादा बना देते हैं। भड़कीला रंग आपके दिमाग को उकसाएगा। एक अच्छे आदमी की संगत में ही आप अच्छा महसूस करेंगे। वातावरण का अपना एक प्रभाव होता है। आत्मा एक जैसी ही होती है, परंतु यह विविध व्यक्तियों में विविध तरीके से प्रभावित होती है। एक डाक्टर के पास एक डाक्टर की ही आत्मा होती है। एक कलाकार के पास कलाकार की कोमल आत्मा होती है। जल का प्रवाह रोका नहीं जा सकता तथा यह समुद्र की ओर प्रवाहित होता रहता है। इसी तरह दिमाग को निरंतर रूप से लक्ष्य पर केंद्रित रखना चाहिए। इच्छाओं व अपेक्षाओं से मुक्त हो जाना, यह कर सकता है।
ऐसा करना दिमाग को शांत रखने के लिए तथा इसके प्रवाह को बनाए रखने के लिए जरूरी है। कोई इच्छा होना न्यायोचित है, परंतु यह ऐसी होनी चाहिए कि जिसे पूरा किया जा सके। यह अच्छा होगा अगर आप ‘नहीं’ को सहन कर सकें तथा इससे समन्वय कर सकें अन्यथा एक अपूरित इच्छा पीड़ा पैदा करेगी अथवा आपको कल्पना के संसार में धकेल देगी। हमें कल्पना में नहीं रहना है।  मैंने पहाड़ों में एक ठिकाना पा लिया क्योंकि मैं अकेला रह सकता हूं तथा प्रकृति से समन्वय कर सकता हूं, लेकिन कल्पना के संसार से नहीं अर्थात रहना कहीं और व सोचना पहाड़ों के बारे में। आपका दिमाग जब कहीं और हो, तो प्रार्थना गाने की क्या उपयोगिता है? दिमाग का कहीं और लगे रहना यह संकेत देता है कि आप जो कर रहे हैं, उसे आप समझते नहीं हैं तथा आप मायूस हो रहे हैं। अपने चंचल दिमाग का उपयोग करना बंद करो। अपने स्थिर दिमाग का प्रयोग करो अर्थात गहन दिमाग। रूटीन की व नीरस रीतियों से बाहर निकलो। तपस्या एक कठिन पूजा है।
यह किसी प्राप्ति के लिए एक प्रयास है। उपलब्धि के लिए सभी साधनों का स्पष्ट नजरिए के साथ प्रयोग करना चाहिए। अभी पीड़ा और उसके बाद आनंद का दर्शन एक बकवास है। नाक की सीध पर अथवा दो भौंहों के बीच स्थिर रहना, जिसे त्रिकुटी कहते हैं, और ये अथवा वो मंत्र बोलना आधारहीन है। पहली व सबसे जरूरी चीज सत्य का एहसास करना है। गुरु जी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह तथाकथित स्वतंत्रता अर्थात मोक्ष नहीं चाहते हैं। सच्चाई यह है कि जीवन से स्थिरता को हटा देना है। इसमें से दुख को हटा देना है। सार रूप में कहें तो सच्चे आनंद के लिए यह जरूरी है कि आप वर्तमान में जीएं। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो आप निश्चित ही कहीं भूतकाल में खोए हैं अथवा भविष्य की दुश्चिंताओं को अपने ऊपर हावी होने दे रहे हैं।
-क्रमशः
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( साभार  :-  संवाददाता   /   एजेन्सी   /   अन्य न्यूज़ पोर्टल  )

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