अग्नि में सभी देवताओं का वास – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

वैदिक वांग्मय में नराशंस के अर्थ होते हैं-यज्ञ और अग्नि। यज्ञ का अर्थ है विष्णु-यज्ञो वै विष्णुः। इससे स्पष्ट होता है कि इन मंत्रों के देवता विष्णु अथवा अग्नि हैं। अग्नि सर्वदेवस्वरूप है। अग्नि में सभी देवताओं का वास है…

-गतांक से आगे…
(ग) उपर्युक्त विवेचन से यज्ञ या यज्ञांग (प्रातः माध्यन्दिन तथा सायं सवनों) में विनियुक्त मंत्रों का देवता परिज्ञान तो होता है, परंतु यज्ञ से भिन्न स्थल में विनियुक्त अनादिष्ट देवताक मंत्रों में देवता का परिज्ञान कैसे होगा। अनिरुक्तों हि प्रजापतिः -इस सिद्धांत के अनुसार वैसे मंत्र प्रजापत्य माने जाएंगे अर्थात उन मंत्रों के देवता प्रजापति होंगे। यह याज्ञिकों का मत है।
(घ) उपर्युक्त याज्ञिक मत से भिन्न नैरुक्तों का सिद्धांत है कि अनादिष्ट देवता का मंत्र नराशंस होते हैं। अर्थात उन मंत्रों के देवता नराशंस माने जाते हैं। वैदिक वांग्मय में नराशंस के अर्थ होते हैं-यज्ञ और अग्नि। यज्ञ का अर्थ है विष्णु-यज्ञो वै विष्णुः। इससे स्पष्ट होता है कि इन मंत्रों के देवता विष्णु अथवा अग्नि हैं। अग्नि सर्वदेवस्वरूप है। अग्नि में सभी देवताओं का वास है। इस सिद्धांत के अनुसार वे मंत्र आग्नेय माने जाते हैं।
(ड.) अनादिष्ट देवताक मंत्रों में देवता के परिज्ञान के लिए पक्षान्तरका प्रतिपादन करते हुए महर्षि यास्क ने लिखा है : अपि वा सा काम देवता स्यात। अर्थात कामकल्पया देवता यस्याम ऋषिः सा कामदेवता ऋक। उन मंत्रों में इच्छा से देवता की कल्पना की जाती है, अतः वे कामदेवताक मंत्र हैं।
(च) अथवा वे अनादिष्ट देवताक मंत्र प्रायोदेवत होते हैं। प्रायः का अर्थ है अधिकार और बाहुल्य। अधिकार-अर्थ में प्रायोदेवत मंत्र का तात्पर्य हुआ कि जिस देवता के अधिकार में वह मंत्र पढ़ा गया है, वही उसका देवता माना जाएगा। प्रायः का बाहुल्य अर्थ मानने पर वैसा मंत्र बहुलदेवत माना जाएगा। लोक में भी ऐसा व्यवहार होता है कि अमुक द्रव्य देव देवत्य अमुक द्रव्य अतिथि देवत्य और अमुक द्रव्य पितृ देवत्य है। किंतु जिस द्रव्य में किसी का निर्देश नहीं होता, वह देव अतिथि और पितर सबके लिए होता है। उसी प्रकार अनादिष्ट देवताक मंत्र सर्वसाधारण होने के कारण बहुलदेव होते हैं।
(छ) इन उपर्युक्त विभिन्न मतों का उपसंहार करते हुए महर्षि यास्क ने कहा-याज्ञ दैवतो मंत्र इति। अर्थात अनादिष्टदेवताक मंत्र याज्ञ अर्थात यज्ञ देवता होते हैं। यज्ञो वै विष्णुः के अनुसार वे मंत्र विष्णु देवता माने जाते हैं। नैरूक्तसिद्धांत में विष्णु द्युरस्थानीय आदित्य हैं, अतः वे मंत्र परमार्थतः आदित्य हैं। यदि वे मंत्र दैवत है (देवता देवता अस्य असौ दैवतः) अर्थात उनके देवता देवता हैं तो अग्निर्वै र्स्वा देवता, अग्निवै देवानां भूयिष्टमाक इत्यादि सिद्धांतों से यहां देवता का अर्थ है अग्नि। फलतः दैवत मंत्र का तात्पर्य हुआ आग्नेय मंत्र, इस प्रकार निरुक्तानुसार देवता का परिज्ञान होता है जो देवता अपने महाभाग्य के कारण अनुष्ठाता के अभीष्ट को पूर्ण करने में समर्थ होते हैं। सार यह है कि अग्नि में सभी देवता वास करते हैं। जब घर में खाना बनता है, तो सबसे पहला भोग अग्नि देवता को ही लगाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में बरकत होती है तथा सुख-शांति बनी रहती है। अग्नि देवता में सभी देवताओं का वास होने के कारण इनकी पूजा सभी देवताओं की पूजा के समान होती है। अग्नि देवता का जीवन में महत्त्व जन्म से लेकर मरण तक है। जब इनसान इस दुनिया से जाता है, तब भी अग्नि काम आती है। -क्रमशः
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( साभार  :-  संवाददाता   /   एजेन्सी   /   अन्य न्यूज़ पोर्टल  )

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