अद्भुत है यह स्थान जहां धरती में समाई थीं माता सीता – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

जिस स्थान पर सीता ने भूमि में प्रवेश किया था, आज उस स्थान को सीता समाहित स्थल के नाम से जाना जाता है, जो उत्तर प्रदेश के संत रविदास नगर में गंगा के किनारे स्थित है। यहां आज भी माता सीता की पूजा देवी के रूप में होती है…

अनसुलझे प्रश्नों की शृंखला में हम इस बार आपको बताएंगे कि आखिर में माता सीता जी का क्या हुआ। क्या वह परलोक गमन कर गईं अथवा उनके साथ कोई और कहानी जुड़ी है? हम आपको यह भी बता दें कि यह प्रश्न अब सुलझा लिया गया है कि माता सीता जी का आखिर में क्या हुआ। इन्हीं तथ्यों के साथ हम आपको माता सीता जी की कहानी सुना रहे हैं। रामायण की कहानी वाकई बहुत अद्भुत है। मुख्य तौर से यह विष्णु के अवतार भगवान राम द्वारा धरती पर आतंक का पर्याय बन चुके राक्षस राज रावण के वध से जुड़ी है, लेकिन इसके भीतर कई ऐसी घटनाएं मौजूद हैं जो वाकई अचंभित करती हैं।
अलौकिक
ये घटनाएं अलौकिक और चमत्कारी हैं, साथ ही संबंधों को भी बहुत खूबसूरती के साथ बयां करती हैं।
श्रीराम
श्रीराम को अयोध्या का राजपाठ मिलने की घोषणा हो चुकी थी और पूरे नगर में हर्षोल्लास का माहौल था। लेकिन भगवान राम की सौतेली माता कैकेयी ने उन्हें राजपाठ नहीं बल्कि चौदह वर्ष के वनवास के लिए भेज दिया।
वनवास
श्रीराम के प्रिय भाई लक्ष्मण और उनकी पत्नी, माता सीता भी उनके साथ वनवास के लिए गईं।
कई लोगों का उद्धार किया
इन चौदह वर्षों में भगवान राम द्वारा कई चमत्कार हुए, उन्होंने कई लोगों का उद्धार किया, हनुमान और उनकी वानर सेना से भी श्रीराम की मुलाकात इन्हीं चौदह वर्षों के दौरान हुई।
रावण
इसके अलावा रावण, जिसने उनकी पत्नी सीता को कैद करने के लिए उनका अपहरण करने का दुस्साहस किया था, उसका वध भी इसी दौरान किया।
चौदह वर्ष
श्रीराम को मिले ये चौदह वर्ष धरती और अन्य लोगों के लिए तो वरदान साबित हुए, लेकिन माता सीता के लिए ये वर्ष अपने पति के इंतजार में बीते और जब मिले तो इन्हीं वर्षों के चलते उन्हें हमेशा के लिए अपने पति का वियोग बर्दाश्त करना पड़ा।
रावण की लंका
माता सीता बहुत समय तक रावण की लंका में कैद रही थीं। वे पवित्रता की मूर्त थीं लेकिन फिर भी उन पर अंगुलियां उठीं। वे अपने पति के सम्मान को बनाए रखना चाहती थीं और इसके लिए उन्होंने अपना सब कुछ छोड़ना भी ज्यादा नहीं समझा।
अयोध्या का महल
श्रीराम का सम्मान उनकी प्रजा के बीच बना रहे, इसके लिए उन्होंने अयोध्या का महल छोड़ दिया और वन में जाकर वाल्मीकि आश्रम में रहने लगीं। वे गर्भवती थीं और इसी अवस्था में उन्होंने अपना घर छोड़ा था।
अश्वमेध यज्ञ
कुछ सालों बाद श्रीराम ने एक अश्वमेध यज्ञ किया। इस यज्ञ के दौरान श्रीराम की मुलाकात अपने जुड़वां पुत्रों लव-कुश से हुई। दोनों एक-दूसरे की पहचान से अनभिज्ञ थे, युद्ध की खबर मिलते ही माता सीता वहां पहुंचीं और उन्होंने अपने पुत्रों की पहचान उनके पिता से करवाई।
लव-कुश
जब श्रीराम को पता चला कि वे लव-कुश उनके पुत्र हैं, तो वे उन्हें और सीता को लेकर महल वापस आ गए।
श्रीराम
श्रीराम अपनी पत्नी सीता को लाने को लेकर आश्वस्त नहीं थे, सीता को भी उनका अपने प्रति व्यवहार सही नहीं लगा।
भूमि देवी
आहत होकर सीता ने भूमि देवी से प्रार्थना की कि वह उन्हें अपने भीतर समाहित कर लें। भूमि देवी ने उनकी प्रार्थना सुनी और उन्हें स्वीकार कर लिया।
संत रविदास नगर
जिस स्थान पर सीता ने भूमि में प्रवेश किया था, आज उस स्थान को सीता समाहित स्थल के नाम से जाना जाता है, जो उत्तर प्रदेश के संत रविदास नगर में गंगा के किनारे स्थित है। यहां पूजा होती है।
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( साभार  :-  संवाददाता   /   एजेन्सी   /   अन्य न्यूज़ पोर्टल  )

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