किसान क्यों हैं आंदोलित ? – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

करीब 35,000 किसान देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और उसके आसपास के क्षेत्र में पहुंच गए हैं। वे महाराष्ट्र विधानसभा का घेराव कर सकेंगे या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है, लेकिन बीती 6 मार्च से किसान आंदोलित और लामबंद हैं। एक अनुशासित ताकत के तौर पर वे पैदल चल रहे हैं। बीते 6 दिनों में 180 किलोमीटर की यात्रा की है। ऐसा नहीं है कि राजनीतिक और सत्तारूढ़ ताकतों ने उन्हें तोड़ने और बिखेरने की कोशिश नहीं की होगी। जब ऐसा नहीं हो पाया, तो महाराष्ट्र सरकार बात करने को तैयार हुई है। फिलहाल आंदोलन पूरी तरह अहिंसक लग रहा है। सवाल है कि बार-बार किसान सड़कों पर उतरने को विवश क्यों होते हैं? इस बार का राष्ट्रीय बजट तो बुनियादी तौर पर ‘किसान बजट’ करार दिया गया है। उसमें किसानों के कल्याण के लिए 11 लाख करोड़ रुपए का फंड बनाया गया है। फसल की लागत की डेढ़ गुना कीमत किसान को मिलेगी। राष्ट्रीय बांस योजना भी तय की गई है। बुनियादी वायदा और लक्ष्य 2022 तक किसानों की आमदनी दुगुनी करने का है। ऐसे आश्वासनों के बावजूद किसान आंदोलित और आक्रोशित क्यों है? देश के 17 राज्यों में किसान परिवार की औसत आय 20,000 रुपए है। करीब 40 फीसदी किसानों को साहूकारों, महाजनों से कर्ज लेना पड़ता है और उन्हें 24 से 50 फीसदी तक ब्याज दर चुकानी पड़ती है। देश के औसत किसान परिवार पर 47,000 रुपए का कर्ज है। कर्जदार किसान परिवारों की संख्या 48 फीसदी से बढ़कर करीब 52 फीसदी हो गई है। यह भारत के किसान का काला यथार्थ है, तो मायने साफ  हैं कि किसी भी सरकार ने ठोस कृषि नीति ही तैयार नहीं की। कृषि और किसान को लेकर जो घोषणाएं की जाती रही हैं, वे महज लालीपॉप रही हैं। यूपीए सरकार के दौरान करीब 70,000 करोड़ रुपए का किसानों का कर्ज माफ  करने का ऐलान किया गया था। वे कौन से किसान थे? और इस दौर में देश के विभिन्न हिस्सों में जो किसान कर्जमाफी की लगातार मांग करते रहे हैं, वे किसान कौन हैं? क्या कर्जमाफी की घोषणाएं करने के बावजूद किसानों के कर्ज माफ  नहीं किए जाते या कोई और कारण हैं? उप्र, पंजाब, मप्र, राजस्थान आदि राज्यों में किसानों के कर्ज माफ  करने के ऐलान किए जाते रहे हैं। तो फिर नए कर्ज किसानों पर कैसे चढ़ जाते हैं? ये कर्ज ही बुनियादी तौर पर किसानों की आत्महत्याओं के कारण हैं। महाराष्ट्र में जो हजारों किसान लामबंद हुए हैं, उनकी भी पहली मांग कर्जमाफी की है। इसके अलावा, वन अधिकार कानून लागू करना, किसानों के लिए पेंशन, उपज की कीमत पर 50 फीसदी मुनाफा, बिजली-पानी बिल माफ  किए जाएं, स्वामीनाथन आयोग की रपट लागू की जाए-किसानों की प्रमुख मांगें हैं। दरअसल सरकारें किसानों की फसल के दामों को मुद्रास्फीति से जोड़ कर देखती रही हैं। यदि 50 फीसदी लागत के अतिरिक्त दाम दिए जाएं, तो उत्पाद भी उतना ही महंगा बाजार में उपलब्ध होगा। मध्यवर्ग उसका विरोध कर सकता है। उद्योग जगत भी ऐसा नहीं चाहता है, लिहाजा आजतक कोई ठोस नीति तैयार नहीं हो पाई। किसानों को लारा लगाया जाता रहा, लेकिन लागू कुछ भी नहीं किया गया। यह सिर्फ  किसानों की ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय समस्या है। महाराष्ट्र से पहले दिल्ली के करीब फरीदाबाद, पलवल में किसानों को आंदोलित होते देखा गया। मप्र के मंदसौर में तो किसान आंदोलन हिंसक ही हो गया। कुछ स्वर उप्र से भी उठे हैं। यदि किसानों की भरपाई के लिए मोदी सरकार ने बजट में ही प्रावधान किए हैं, तो उन्हें लागू करने का विश्वास दिलाया जाए। किसान खेत-खलिहान छोड़कर सड़कों पर नारे क्यों लगाए? फिर कुछ पार्टियां उसका राजनीतिक लाभ क्यों उठाएं? हर बार स्वामीनाथन आयोग की रपट की चर्चा सालों से सुन रहे हैं। आखिर उसकी सिफारिशें ऐसी कैसी हैं कि लागू न की जा सकें? कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि स्वामीनाथन आयोग की रपट किसी भी सरकार ने पूरी तरह पढ़ी ही नहीं है। उसमें 50 फीसदी लागत से अधिक की बात ही ऐसी है, जिसका किसानों से वादा किया जाता रहा है। विशेषज्ञों का दावा है कि स्वामीनाथन आयोग की रपट से ही किसानों की समस्याएं सुलझने वाली नहीं हैं। सरकारों को ही ठोस नीतियां बनानी पड़ेंगी और ईमानदारी से उन्हें लागू करना पड़ेगा। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो किसान सड़कों पर आंदोलित ही दिखाई देंगे। यदि मौजूदा आंदोलन सफल हो गए, तो देश के अन्य राज्यों में भी आंदोलनों का विस्तार होगा।
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( साभार  :-  एजेन्सी / संवाददाता  / अन्य न्यूज़ पोर्टल  )

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