यह मेरा या तेरा बिलासपुर – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

विरोध के प्रश्नों में कांगे्रस का मंतव्य स्पष्ट है, लेकिन इस धार को एकदम नकारा नहीं जा सकता। भले ही विधानसभा से लगातार वाकआउट करने की वजह से सदन के अपने बिंदु अछूते रह गए हों, लेकिन कुछ तो है, जो बांध विस्थापितों के दर्द की आंच में तपना भी गुनाह नहीं। हिमाचल विधानसभा में रामलाल ठाकुर का निजी संकल्प भले ही गिर गया, लेकिन भाखड़ा बांध विस्थापितों का मुद्दा उठाने का यह मंजर जीत गया। हालांकि हम यह नहीं कह सकते कि भाखड़ा और पौंग बांध विस्थापितों के संघर्ष में कांगे्रस पार्टी या इसकी सरकारों ने अहम भूमिका निभाई या आज तक गंभीर मसले को किसी अंजाम तक ले जाने में सफलता पाई, लेकिन निजी संकल्प के बहाने विषय में लिपटा भाखड़ा विस्थापितों का विषाद उछल गया। यहां बिलासपुर के दो पाटों में खड़ी सभ्यता तड़प रही है, तो कानून के शिकंजे में अपराधी बनने की वजह को सामाजिक कचहरी में स्वीकार करने का दर्द भी है। कानूनन यह हक की लड़ाई नहीं हो सकती कि कोई विस्थापित अपने पुनर्वास के तंबू के नीचे बैठकर अतिक्रमण करे, लेकिन जिनके घर डूबे हों, गलियां खामोश हो गई हों या रिश्ते बिखर गए हों, उन्हें ज्यादा पाने का अधिकार कौन देगा। बेशक विस्थापितों के हित में पूर्व कांगे्रस सरकार के नीतिगत फैसले के तहत डेढ़ सौ वर्ग मीटर तक के अतिरिक्त कब्जों को नियमित करने की छूट मिली, लेकिन यह घर है कि इस फासले पर रुकता नहीं। ऐसे में एक ही प्रश्न के दो पहलुओं पर बिलासपुर को समझना होगा। डूबे हुए अस्तित्व की कब्र पर मुआवजे का दीया जला दिया जाए या उस सूर्योदय की महत्त्वाकांक्षा समझी जाए, जो नए बिलासपुर की आबादी में आज भी पीड़ा का घर है। आज तक यह क्यों नहीं सोचा गया कि विस्थापन एक माननीय आपदा है और इसे हल करने के लिए केवल सियासी या प्रशासनिक समाधान नहीं, बल्कि विस्थापित समाज को शक्ति प्रदान करने की राष्ट्रीय मंशा तैयार करनी होगी। अगर पिछली आधी सदी के उस उजड़े माहौल को देखा जाए, तो क्या हम नया बिलासपुर बसाकर किश्तियां चला पाए। क्या डूबे मंदिरों की घंटियां बजा पाए या समाधान के बिछौने पर इस पीड़ा को रख पाए। इससे भी विचित्र विकरालता में पौंग विस्थापितों का दर्द सामने आता है, तो समय की रेत पर खोया वजूद दिखाई नहीं देता। पुनर्वास की फाइलों में सियासत का दंभ भरा हो सकता है, मगर हकीकत की जमीन का खोना क्या होता है, किसी विस्थापित की आंख से टपकते आंसू से पूछिए। क्या राजनीति की किसी सरहद को समझ आएगा कि हिमाचली नीतियों को कुचल कर जब बड़े बांधों का पानी रेगिस्तान को हरियाली देता है, तो विस्थापित होने का पैमाना कितना खाली होता है। कौन भरेगा इस खालीपन को, जो वर्षों बाद भी टीस लिए अपने अस्तित्व को टटोलता है। किसी अदालत के लिए अवैध कब्जों पर फैसला लेना कठिन नहीं, लेकिन विस्थापन के बदले पुनर्वास की पैमाइश किसी भी मानदंड से शायद ही कभी पूरी होगी। इसीलिए जो दर्द भाखड़ा में डूबने का है, वही पौंग के हर छोर पर आकर तड़पता है। इसे समझना है, तो पौंग जलाशय के बीच दर्द के टापू पर बैठे कुठेड़ा गांव के दो सौ के करीब निवासियों की आंखों में झांक कर देखें। यह गांव नहीं ऐसी जिद है, जो बांध में जल भराव के बावजूद अपने अस्तित्व की जमीन को कतई खोना नहीं चाहती। यह गांव अपने विस्थापन के खंडहर में आबाद है, लेकिन सामान्य सुविधाओं से भी महरूम। न बिजली, न पानी, लेकिन एक पोलिंग बूथ जरूर बन गया, ताकि मतदान हो जाए। कुठेड़ा गांव की अस्थियों में दिखाई देते विस्थापन को समझें, तो जमीन और जमीर दोनों नजर आएंगे। यह है वह तस्वीर जो साथ लगते पौंग की विरासत में हर दिन मरती है, लेकिन किसे फुर्सत कि इस गांव के आदिम हो चुके जीवन को छू कर देखे। ठीक ऐसे ही बिलासपुर शहर में आधुनिक हो चुके जीवन के नजदीक खड़ी आहों को सुनना होगा। फैसला यह करना होगा कि शहर को पुनर्वास का घर माना जाए या अतिक्रमणकारियों का अड्डा। बेशक नए समाज के साथ आज का बिलासपुर कसूरवार हो गया, मगर सामने जब अपने पुरखों के बलिदान में समाए दर्द के समुद्र को देखता है, तो अपनी प्रगति पर शक होता है। बिलासपुर ने दो अपराध किए, पहले डूबकर और अब तैरने की जिरह में अपने पुनर्वास की जमीन को फैलाकर। हम इस पक्ष को राजनीतिक मान लें या कानून की परिभाषा में अतिक्रमण, पर कहीं उस मानवीय आपदा पर गौर करें, जो विकास की नई परिभाषा में विस्थापन के रूप में तसदीक होती है।
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( साभार  :-  एजेन्सी / संवाददाता  / अन्य न्यूज़ पोर्टल  )

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