‘ विशेष दर्जे ’ की सियासत – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

एक दौर में चंद्रबाबू नायडू संयुक्त मोर्चा के संयोजक होते थे। फिर पाला बदल कर अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए के साथ जुड़ गए। बेशक समर्थन बाहरी था, लेकिन देश और वित्त मंत्रालय के रिकार्ड साक्ष्य हैं कि उस दौर में भी आंध्रप्रदेश को कितना माल मिला और कितनी योजनाएं उसके हिस्से आईं। नायडू तब के प्रधानमंत्री वाजपेयी को परोक्ष रूप से धमकाते भी रहे कि समर्थन वापस ले लेंगे। 2002 में गोधरा सांप्रदायिक कांड क्या हुआ कि नायडू ने वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस ले लिया। उसके बाद नायडू को एक लंबा राजनीतिक वनवास झेलना पड़ा। कांग्रेस ने उन्हें भाव नहीं दिया। अंततः 2014 में उन्होंने मोदी को ‘वक्त की जरूरत’ करार दिया। चूंकि आंध्र का विभाजन होकर तेलंगाना एक नया राज्य बन चुका था। तब विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ ही हुए। जो जन समर्थन उस दौर में मोदी और भाजपा को मिला, उसका फायदा नायडू की तेलुगूदेशम पार्टी (टीडीपी) को भी मिला। बहरहाल टीडीपी एनडीए का हिस्सा बनी और आंध्र में पहली बार टीडीपी और भाजपा की सरकार बनी। केंद्र में मोदी सरकार बनी, तो टीडीपी कोटे से अशोक गजपति राजू और वाईएस चौधरी मंत्री बने। टीडीपी प्रमुख एवं मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के आदेश पर उन्हें कैबिनेट से इस्तीफे देने पड़े हैं, लेकिन बुनियादी सवाल है कि टीडीपी अब भी एनडीए में क्यों है? मंत्रियों के इस्तीफों की भाषा भी ‘प्रेमपत्र’ और प्रधानमंत्री मोदी के प्रति ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ जैसी है। इस दोगलेपन को क्या कहा जाए? लिहाजा मानना पड़ता है कि यह नूराकुश्ती के अलावा कुछ भी नहीं है। इस बार भी लोकसभा चुनाव के साथ ही आंध्र के चुनाव होने हैं, लिहाजा नायडू ने एक भावनात्मक अपील उछाली है कि केंद्र ने ‘विशेष राज्य के दर्जे’ का वादा नहीं निभाया। भाजपा और टीडीपी दोनों ही अलग-अलग चुनाव लड़ेंगी, लेकिन कोई कठोर भाषा या आरोपों का सहारा नहीं लिया जाएगा, ताकि चुनाव के बाद फिर गठबंधन हो सके। दरअसल आंध्र प्रदेश का विभाजन कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान किया गया था। तत्कालीन कैबिनेट ने प्रस्ताव पारित कर योजना आयोग को भी भेजा था। तब केंद्र में 13वां वित्त आयोग काम कर रहा था, जिसमें राज्यों को विशेष दर्जा दिए जाने पर पाबंदी नहीं थी। हालांकि 5वें वित्त आयोग ने विशेष दर्जे के राज्य के लिए कुछ शर्तें तय की थीं। उस दौर में बिहार और ओडिशा ने भी विशेष दर्जा दिए जाने के आग्रह किए थे। उनके समेत आंध्र न तो पहाड़ी भू-भाग वाला राज्य है, न ही बहुत कम जनसंख्या वाला राज्य है और न सीमावर्ती इलाका है। हालांकि मनमोहन सरकार चाहती, तो आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा दे सकती थी, लेकिन अब 14वें वित्त आयोग ने विशेष राज्य के दर्जे का प्रावधान ही समाप्त कर दिया है। यह एक संवैधानिक संस्था है, लिहाजा उसका उल्लंघन कैसे किया जा सकता है। हालांकि मोदी सरकार अभी तक आंध्र प्रदेश को 12,500 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद दे चुकी है। इसके अलावा  आईआईटी और आईआईएम जैसे शैक्षिक संस्थान भी दिए हैं। फिर वित्त मंत्री अरुण जेतली ने विशेष राज्य के दर्जे से इनकार किया है, जबकि आर्थिक मदद का बराबर आश्वासन दिया है। यदि आंध्र वाकई विपन्न, गरीब, बदहाल है, तो वह आर्थिक मदद से इनकार क्यों कर रहा है? यही राजनीतिक बिंदु है, क्योंकि इसी मुद्दे पर विपक्षी वाईएसआर कांग्रेस और वामपंथी दल भी सड़कों पर हैं। वे सड़क से संसद तक प्रदर्शन जारी रखे हैं। हालांकि लंबे समय से टीडीपी भी संसद में मोदी सरकार की फजीहत करवा रही थी। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने मुख्यमंत्री नायडू से फोन पर बातचीत की थी। केंद्र में प्रधानमंत्री से लेकर सभी मंत्रियों तक नायडू की ‘पहुंच’ बरकरार रही है। उनकी मांगें मानी जाती रही हैं। लोकसभा में टीडीपी के 16 सांसद हैं। इसके अलावा 18 सांसदों वाली शिवसेना भी सरकार को दुखी करती रही है। बहरहाल नायडू को विशेष राज्य के दर्जे से कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं है और मोदी सरकार ऐसा कर नहीं सकती, लिहाजा अब सियासत इसी मुद्दे पर होगी। जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस को आंध्र में भाजपा से गठबंधन करने पर कोई एतराज नहीं है, लिहाजा चुनौतियां टीडीपी और उसके मुखिया नायडू के ही सामने हैं।
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( साभार  :-  एजेन्सी / संवाददाता  / अन्य न्यूज़ पोर्टल  )

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