खुरदरी सतह पर बजटीय कालीन – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

कल तक विपक्ष में ही रही भाजपा को अब हिमाचली बजट से साबित करना है कि कंगाली में आटा गीला नहीं होगा और न ही फिजूलखर्ची की दौड़ में यह बजट शरीक होगा। कर्ज की तहों से बजटीय खुराक क्या होगी और नई सरकार का तिलिस्मि क्या होगा, यह मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के लिए अग्निपरीक्षा की तरह है। नूर उस फिजा का भी तराशा जाएगा, जिसने भाजपा की झोली में हिमाचल का भविष्य सौंपा तथा यह भी देखा जाएगा कि आर्थिकी की खुरदरी सतह पर किस हद तक बजटीय कालीन बिछेगा। आशाओं के बीच कड़वे घूंट पीने की वजह और तमाम बाधाओं से आगे निकल जाने की अदा में बजट की परिभाषा परखी जाएगी। इसमें सत्ता का नया नूर तो इच्छाशक्ति का सुरूर देखा जाएगा। बेशक आर्थिक विपन्नता और कर्जदारी के चिट्ठों को दरकिनार करके भी दरियादिली में राजनीतिक विवशताएं अपने समाधानों की सूली पर चढ़ने को आमादा रहें, लेकिन मुख्यमंत्री अपनी प्राथमिकताओं का खाका बुलंद कर सकते हैं। यह दीगर है कि बजट पूर्व का सियासी जोश कई वादे कर चुका है और मंत्रिमंडलीय  बैठकों में भी जनापेक्षाओं का आभार प्रकट किया गया है। एक ओर हिमाचल को विकास के नए मुहाने, तरक्की के नए अफसाने और सत्ता को अपने तराने पेश करने हैं, तो सामने पचास हजार करोड़ से ऊपर बढ़ते कर्ज की सीमा भी निर्धारित करनी है। सरकार को कर्मचारी दिल तक जाना है, तो खेत-बागान का सूखापन मिटाना है। बेशक सरकार के पास पार्टी का दृष्टिपत्र है और केंद्र में अपने ही प्रधानमंत्री का प्रश्रय, लेकिन मसले वित्तीय सरहदों पर खड़े हैं। केंद्र से हिमाचल की तरफदारी के फिलहाल सबूत नहीं मिले हैं। धर्मशाला-शिमला को स्मार्ट सिटी की पोशाक पहनाने की कीमत अगर मोदी सरकार अदा नहीं करती, तो नकाब उतरेगी। कई अन्य परियोजनाएं भी विशेष राज्य के दर्जे में, केंद्रीय वित्तीय पोषण का 90ः10 के अनुपात में इंतजार कर रही हैं और अगर इस दिशा में प्रगति नहीं होती, तो हिमाचल में बदलाव की बयार में भी राज्य का बजट उदास रहेगा। सरकार की अपनी महत्त्वाकांक्षा कितना बोझ उठाती है या प्रदेश और कितना कर्जदार होता है, यह बजट की नीयत व संतुलन से सामने आएगा। फिलहाल सरकारी मशीनरी को चलाने और सही ढंग से चलाने का श्रम, जयराम सरकार के पहले बजट का पसीना बहाएगा और तब मालूम होगा कि राजनीतिक इच्छाशक्ति है कितनी। प्रदेश को शिक्षा-चिकित्सा क्षेत्र में सामाजिक सुरक्षा के आलेप से कहीं आगे इनकी गुणवत्ता निर्धारित करनी है, तो नए संस्थानों के प्रतीक्षारत उद्देश्यों को मुकम्मल करना है। नए मेडिकल कालेजों की पट्टिकाओं पर चढ़े मुलम्मे को उतार कर इन्हें सक्षम बनाने का यह अर्थ कदापि स्वीकार्य नहीं कि भारतीय चिकित्सा परिषद के निरीक्षण-परीक्षण में पहले से स्थापित अस्पताल बीमार होते जाएं। इसलिए आवश्यक नियुक्तियों के खाके में प्रवेश करते बजट की हिस्सेदारी के बावजूद यह भी देखा जाएगा कि भाजपा सरकार के बजट से सरकारी कर्मचारियों के वेतन-भत्तों व पेेंशन आदि की अदायगी के बाद जनकल्याण व विकास के लिए बचेगा क्या। इतना ही नहीं, हिमाचल की युवा परिधि में बेरोजगार होते वर्ग के लिए आशाओं की कोई मंजिल बजट लिख पाएगा या यूं ही राजनीतिक अंगुली पकड़कर इन्हें वादों की खोखली बारात के साथ चलना पड़ेगा। जयराम सरकार से स्वरोजगार के ऐसे प्रारूप की उम्मीद की जाती है, जो आने वाली पीढि़यों को रास्ता दिखाए। इसलिए पर्यटन, मनोरंजन व सांस्कृतिक क्षेत्र में कितना निवेश होता है, इसकी प्रतीक्षा रहेगी। क्या बजटीय प्रावधान किसी रोडमैप पर अग्रसर होकर युवाशक्ति को स्वरोजगार की ओर प्रेरित करेगा, यह सबसे बड़ी उम्मीद रहेगी। यह दीगर है कि अधोसंरचना के हिसाब से सड़कों पर केंद्रीय घोषणाओं का असर और स्पष्ट होगा तथा अन्य समाधानों में केंद्र-राज्य के रिश्ते नए सुर सजाएंगे, फिर भी जयराम सरकार को अपना कद व आकार सुनिश्चित करना होगा। वित्तीय घाटे व गैर योजना खर्च पर नियंत्रित बजट तभी कारगर होगा अगर सरकार अपने सफेद हाथियों पर अंकुश या विनिवेश की राह पर घाटे के बोर्ड-निगमों का युक्तिकरण करे। यह बजटीय चादर है, जहां जयराम सरकार को संभल कर पांव पसारने होंगे। अगर राजनीति से ऊपर उठकर बजट पेश होता है, तो हिमाचल अपनी आबरू सुरक्षित रख पाएगा वरना आर्थिक दिक्कतों के बीच लेखा-जोखा लिखने के लिए उधार की कलम सवार रहेगी।
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( साभार  :-  एजेन्सी / संवाददाता  / अन्य न्यूज़ पोर्टल  )

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