यह तालिबानी हरकत – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से कुछ ही दूरी पर वामपंथ और रूसी क्रांति के नायक रहे लेनिन की मूर्ति पर बुलडोजर चलाकर उसे जमींदोज कर दिया गया। उसके बाद दक्षिण त्रिपुरा में लेनिन की एक और मूर्ति तोड़ कर मिट्टी में मिला दी गई। ये निश्चित तौर पर तालिबानी हरकतें हैं। बेशक त्रिपुरा में वामपंथी विचारधारा की पार्टियां चुनाव हार गईं,लेकिन उसके प्रति प्रतिक्रिया असहिष्णु नहीं हो सकती। यह ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के दर्शन और मूल्यों क खिलाफ है। यह ‘सभी सुखी रहें’ के भाव का उल्लंघन है। यह हमारे सांस्कृतिक और वैश्विक मानस के भी खिलाफ है। मूर्तियों का अपना इतिहास है। मूर्तियां श्रद्धा और आस्था के भाव से भी स्थापित की गईं। उनके पीछे वैचारिक प्रतिबद्धता भी रही है। मूर्तियां प्रेरणा भी देती रही हैं। मूर्तियां अधिनायकवाद की प्रतीक भी रही हैं। उन्हें तोड़ा क्यों जाए? लेनिन एक दौर के वैचारिक नायकों में से एक हैं। रूस की क्रांति का आह्वान और नेतृत्व उन्होंने ही किया। हालांकि रूस में ही उनकी सभी महत्त्वपूर्ण मूिर्तयां ध्वस्त कर दी गई हैं। लेनिन ने मार्क्सवादी सोच को लामबंद किया। बेशक लेनिन, मार्क्स, स्टालिन और माओत्से तुंग के कालखंडों का इतिहास खून, नफरत और हत्याओं से भी भरा है। ‘ब्लैक बुक ऑफ कम्युनिज़्म’ के संदर्भों पर विश्वास करें, तो लेनिन के दौर में 10 करोड़ से ज्यादा लोगों की हत्याएं की गईं। महात्माओं ने हमें प्रतिशोध के सबक नहीं सिखाए हैं। हमने माफी देना सीखा है। लेनिन सरीखे तत्कालीन नायकों के जो बुत, प्रतिमाएं स्थापित की गई थीं और उन दौरों की सरकारों ने उन्हें अधिसूचित किया था, उनके चुनाव हारने पर प्रतिमाओं को इस तरह ध्वस्त किया जाना हमारे सांस्कृतिक मूल्यों के मुताबिक नहीं है। इस तरह उन खोए हुए, बिसरा दिए गए नायकों को हम दोबारा प्रासंगिक बना रहे हैं। हम भी बाबर और दूसरे विदेशी हमलावरों का चोला पहन रहे हैं, जिन्होंने हमारे मंदिर, स्मारक, बुत जमींदोज किए थे। स्मरण रहे, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, कुछ वैज्ञानिकों और महात्मा समाज सुधारकों की कई प्रतिमाएं दुनिया भर में स्थापित हैं। जरा यह भी सोचिए, अफगानिस्तान में तालिबान ने जब सदियों पुरानी महात्मा बुद्ध की ऐतिहासिक प्रतिमा को खंडित और ध्वस्त किया था, तब भारत के औसत नागरिक को कितनी पीड़ा हुई थी? कितना गुस्सा उभरा होगा? लेनिन की मूर्ति जमींदोज करने से वामदल अपमानित हुए और आग-बबूला भी हुए। आरोप चस्पां किए गए कि ये प्रतिमाएं भाजपा और संघ के समर्थकों ने तोड़ी हैं। इस घटना के बाद त्रिपुरा के 13 जिलों में आगजनी की गई। करीब 1549 घरों पर हमले किए गए। सीपीएम के दफ्तरों पर हमले किए गए। त्रिपुरा प्रतिशोध, पलटवार और हिंसा में जल उठा। क्या विरोधी वैचारिकता वालों के साथ ऐसा बर्ताव किया जाना चाहिए? बेशक दुनिया के मानचित्र पर गौर करें, तो यूक्रेन में 1000 से ज्यादा लेनिन की मूर्तियां तोड़ दी गई हैं। जर्मनी ने भी 1992 में लेनिन की मूर्तियां तुड़वा दीं। मंगोलिया और ताजिकिस्तान में भी ऐसा ही किया गया है। आज लेनिन उस विचारधारा के लुप्त होते प्रतीक हैं, जो धीरे-धीरे दुनिया से गायब हो रही है। भारत में भी वामपंथी दल अप्रासंगिक करार दे दिए गए हैं। सिर्फ केरल में सरकार बची है, जहां 1957 में लेफ्ट की प्रथम सरकार बनी थी। ‘लाल सलाम’ बहुत तेजी से ‘केसरिया राम-राम’ में तबदील होता जा रहा है। फिर क्या जरूरत थी कि लेनिन की प्रतिमा गिरा कर सहानुभूति के कुछ क्षण वामपंथियों को मुहैया कराए जाएं? 1951-52 के लोकसभा चुनाव में वामदलों के 16 सांसद जीत कर आए थे, आज तो दर्जन भर भी नहीं हैं। चुनाव ने उनका सूपड़ा साफ  कर दिया, तो लेनिन पर गुस्सा निकालने की क्या आवश्यकता थी? त्रिपुरा में ही जिस मार्ग पर मुख्यमंत्री आवास है, मंत्री भी रहते हैं, उस सड़क का नाम मार्क्स, एंजेल्स के नाम पर आज भी है। अंडेमान निकोबार में 572 ऐसे द्वीपसमूह हैं, जिनके नाम ब्रिटिश सरकार के दरिंदे, जुल्मी नेताओं और नौकरशाहों के नाम पर आज भी हैं और शहीदों, क्रांतिकारियों की पूछ तक नहीं है, लेकिन लखनऊ में राजकीय संग्रहालय के पिछवाड़े देखें या दिल्ली के कोरोनेशन पार्क में देखें, तो वहां महारानी विक्टोरिया, कई वायसराय और अनेक अंग्रेज अफसरों की मूर्तियां दिखाई देंगी। आज़ादी केबावजूद ब्रिटिश साम्राज्य की इन निशानियों को जमींदोज नहीं किया गया। उपेक्षा, अकेलापन, मिट्टी, पक्षियों केमल-मूत्र का शिकार होने के लिए उन मूर्तियों को छोड़ दिया गया है। लेनिन को भी ऐसे ही छोड़ दिया जाना चाहिए था ताकि उनकी आत्मा देख और महसूस कर सके कि ‘लाल आतंक’ के बजाय ‘केसरिया शासन’ कैसा होता है। यदि फिर भी महसूस किया जाता कि लेनिन के बुत आंखों और मानस में चुभ रहे हैं, तो विधानसभा के जरिए प्रस्ताव पारित करा उन्हें हटाया जा सकता था। लेकिन इस तरह बुलडोजर चलाकर प्रतिमाओं को ध्वस्त करना हमारी नहीं, तालिबान की संस्कृति है और हम कभी भी तालिबान नहीं बनना चाहेंगे।
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( साभार  :-  एजेन्सी / संवाददाता  / अन्य न्यूज़ पोर्टल  )

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