राजनीतिक शो नहीं बजट सत्र – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

बजट सत्र अगर राजनीतिक शो है, तो कांगे्रस ने पहल करते हुए अपनी अदाकारी दर्ज कर दी। हिमाचल विधानसभा सत्र का पहला और दूसरा दिन खेत गया, तो इसकी सियासी पराली का धुआं आगे चलकर माहौल को प्रभावित ही करेगा। विपक्ष का वाकआउट एक परंपरा के मानिंद अब विधानसभा कार्यवाही का स्लोगन हो चला है और इसी तर्ज पर हम अपने जनप्रतिनिधियों को सड़क पर देखते हैं, जबकि सड़क के मसलों पर अब राजनीति नहीं चलती। जिस विषय पर कांग्रेस विधायक आपे से बाहर हो गए, उसकी गंभीरता से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था का चीरहरण, किसी के अस्तित्व की ढाल नहीं बन सकता। धारा 118 पर बहस कौन नहीं चाहता, लेकिन मुद्दे को चरागाह बना देने से हम चिंतन नहीं कर सकते। विडंबना भी यही है कि राजनीतिक फसाद को बस एक मुद्दा चाहिए और यह रिवायत भाजपा से भी अछूती नहीं, बल्कि एक ही राजनीति के दो पहलू हैं। सत्ता की भाषा और विपक्ष की बोली में अंतर केवल राजनीति के पक्ष का है, लेकिन बहिर्गमन की आदत में कहीं नूरा कुश्ती का हिसाब तो नहीं होता रहेगा। राजनीतिक विरोध की लोकतांत्रिक मर्यादा से बाहर कहीं फैसले होने लगेंगे, तो सत्य-असत्य, वाद-विवाद और सही-गलत के बीच अंतर मिट जाएगा। दूसरी ओर सत्ता की मचान अब राजनीतिक असहमति हो चली है और इसके दुष्प्रभाव में सरकारों की निरंतरता को अकालग्रस्त होते देख सकते हैं। प्रायः नीतियों-कार्यक्रमों व योजनाओं-परियोजनाओं को सत्ता बदलते ही नए मुलम्मे में प्रदर्शित करने की आवश्यकता समझ नहीं आती। हिमाचल में सत्ता बदलाव के कई पक्ष भी शिरकत करते हैं और इसलिए आका बनकर फैसलों की तहरीर में स्थानांतरण, कार्यालयों का आबंटन, स्कूल-कालेजों व चिकित्सा संस्थानों का औचित्य सिद्ध करते हुए धारा 118 तक के निर्णयों में नीयत भी सौदेबाजी बन जाती है। जिस धारा 118 पर कांगे्रस प्रदेश की सबसे बड़ी हितैषी दिखाई दे रही है, उसके मूल में प्रश्नों का गुबार है। बहस ही न हो तो पता कैसे चलेगा कि विवादित धारा के आशियाने में सरकारों ने आज तक कितने लाभ बांटे और दुरुपयोग किस हद तक माफिया सरीखा हो गया। हम यह कैसे मान लें कि धारा 118 ने हिमाचली अस्तित्व की हमेशा रक्षा की या इसके कारण सियासी आखेट नहीं हुआ। क्या कभी पारदर्शी तरीके से ऐसा कोई श्वेत पत्र आया, ताकि पता चले कि कानून के आंचल में बैठकर फिरौती क्या रही। कौन-कौन, कब लाभार्थी रहा। इस तस्वीर को बताने की जहमत कांगे्रस क्यों नहीं उठाती। अगर यह विषय सामाजिक अस्मिता से जुड़ता है, तो अब तक के दुरुपयोग में धारा 118 किस तरह की देवी मानी जाएगी। दूसरी ओर इस धारा को अस्त्र बनाकर जो सियासत आज तक हुई, उसे भी समझना होगा। कब यह मुखौटा बनकर डराती रही और कब निर्वस्त्र होकर नाचती रही। ऐसा निष्कर्ष तथ्यों के आधार पर हमेशा सामने आता है कि धारा 118 के कारण या तो सियासी माफिया पैदा हुआ या यह खुद जल्लाद बनकर निवेशक को हिमाचल से दूर करती रही। जिन परिस्थितियों में बड़ी औद्योगिक इकाइयां या निवेश की संभावनाएं यहां से रुखसत हुईं, उन्हें समझने या उस पर बहस कब होगी। जवाबदेह विपक्ष के रूप में कांगे्रस को भी कई प्रश्नों का उत्तर देना है और यह स्पष्ट है कि सत्ता के दौर में उनके दामन में भी धारा 118 सुराख करती रही है। ऐसे में यह बहस जरूरी है कि हिमाचल में ईज ऑफ डूईंग बिजनेस का समाधान आखिर है क्या। वर्षों से प्रदेश में रह रहे हिमाचली कुनबे को क्या पहचान दी जाए। जो वर्ग हिमाचल का विकास कर रहा है या जो रोजगार को आबाद कर रहा है, उसे अपमानित करने का प्रादेशिक गौरव आखिर है क्या। धारा 118 पर विवाद करने से पहले हिमाचली अस्मिता को भी तो सुदृढ़ किया जाए। हरी-मैरून टोपियां पहनकर खड़ी सियासत या विलुप्त होती हिमाचली लोक जीवन पर आधारित कोई ऐसी अस्मिता है, जिसका क्षेत्ररक्षण किया जाए। हिमाचली मेलों में बिकते बाहरी कलाकार के सामने हिमाचली गायक के आंसू कब पौंछे या कब संविधान की सूची में हिमाचली भाषा के लिए राजनीति आंदोलनरत हुई, जिस हिमाचली के खेत पर बंदरों का कब्जा हो गया हो, उससे भी तो पूछें कि अस्मिता होती क्या है। हिमाचल के बाहर दर-दर भटकते बेरोजगारों से विपक्ष पूछ ले कि उसका दर्द क्या है। बेशक कांगे्रस के पास वाकआउट करने की शक्ति, माद्दा व साहस है, लेकिन विपक्ष का सामर्थ्य केवल सार्थक बहस है। धारा 118 पर अब तक बहस नहीं, तो इसका यह अर्थ नहीं कि ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जा सकते। सत्ता पक्ष के लिए भी यह अवसर हो सकता है कि ऐसे प्रश्नों पर सियासी सहमति के लिए खुली बहस कराएं। हर नीति और हर नियम पर बहस होना अगर लोकतांत्रिक शगुन है, तो इसे दरकिनार करना अहंकार ही माना जा सकता है। विपक्ष अगर सड़क पर डेरा जमाएगा, तो भीतर सदन का उफान थम नहीं जाएगा। यह प्रदेश भी तो अपने आईने के सामने हमेशा यह प्रतीक्षा करता है कि सत्ता और विपक्ष उसके मूल प्रश्नों का हल ढूंढे। फिलहाल वाकआउट की परिस्थितियों में सत्ता के गले में भी प्रश्न पट्टियां लटकेंगी।
. राजनीतिक शो नहीं बजट सत्र appeared first on Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news….

( साभार  :-  एजेन्सी / संवाददाता  / अन्य न्यूज़ पोर्टल  )

ताजा खबरों के हिन्दी में अपडेट लगातार पाने के लिए हमारा फेसबुक पेज लाइक करें, आप हमे ट्विटर पर भी फालो कर सकते है |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

x

Check Also

नए विचारों की अभिलाषा – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

हिमाचल की सरकारी छत अगर अपनी छांव का विस्तार करे, तो तरक्की के फासले और नागरिक उम्मीदों की दूरियां कम हो जाएंगी। जनसंवाद के जरिए सरकार ने जनता की चौपाल तो संवारनी शुरू कर दी, लेकिन हिमाचली दफ्तरों का माहौल, जिम्मेदारी और जवाबदेही की मानिटरिंग चाहिए। कुछ साल पहले जेल विभाग ने कैदियों के जीवन पर सोचना शुरू किया, तो आज हिमाचल की प्र्रमुख जेलें, जीवन की राह पर स्वावलंबन की मंजिल ब