शहरी दायरे की शक्तियां – Divya Himachal: No. 1 in Himachal news – News – Hindi news – Himachal news – latest Himachal news..

एक साथ बीस नगर निकायों को शक्तियां प्रदान करके ग्राम एवं नगर योजना विभाग के बचे-खुचे दांत निकाल दिए गए हैं या यह कदम शहरीकरण की कोई व्यवस्था लेकर आ रहा है, कहना मुश्किल है। अब शहरी कस्बों में निर्माण कार्यों की अनुमति नगर परिषदों के कार्यकारी अधिकारी व नगर पंचायत सचिव देंगे। जाहिर है ऐसे सरलीकरण का लाभ आम जनता को मिलेगा, लेकिन उस पैमाइश का क्या होगा, जो ग्राम एवं नगर योजना कानून की परिधि में आवश्यक है। करीब चार दशक पुराना हो चुका कानून अब एक मजाक की तरह सियासी सूली पर टंगा है। कमोबेश हर सरकार ने नगर नियोजन की मूल भावना पर प्रहार करते हुए टीसीपी विभाग की प्रासंगिकता को ही आघात पहुंचाया, नतीजतन शहरीकरण की एक अत्यंत दयनीय तस्वीर सामने आ रही है। शहरी विकास के मायने पूरी तरह खोखले व विध्वंसक साबित हुए हैं और जिसकी हालत पर राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल के फैसलों के जरिए हम गौर कर सकते हैं। एनजीटी के सख्त फैसलों से शिमला, मनाली धर्मशाला-मकलोडगंज, कसौली व नयनादेवी सरीखे शहरी आवरण में हमारे विकास योजना प्रारूप की खामियां स्पष्ट हैं। इसी दायरे में धर्मशाला के शहरी नागरिकों की मांग का संज्ञान लिया जाए, तो समझ में आएगा कि निर्माण व विकास के बीच सामंजस्य कैसे स्थापित होगा। धर्मशाला के सार्वजनिक खेल मैदान के छोर पर पुलिस विभाग भवन निर्माण पर आमादा है, लेकिन न सरकार, न नगर नियोजन की परिभाषा और न ही जनापेक्षाएं इसे रोक पा रही हैं। ऐसे में न जाने कितनी विभागीय इमारतें बिना किसी योजना व अनुमति के नियोजन की संरचना का मजाक उड़ा रही हैं। हम टीसीपी विभाग के दांत तोड़कर राजनीतिक जुबान तो दिखा सकते हैं, लेकिन इस तहरीर में नियोजन की बाध्यता खत्म करके, भविष्य नहीं संवार सकते। ऐसे में शहरीकरण को संबोधित करने की आवश्यकता पर यह फैसला कुछ स्वाभाविक प्रश्न उठाता है। अब तक टीसीपी कानून के तहत जो कसरतें हुईं, उन्हें गलत मान लिया जाए या इस आशय की विभागीय शक्तियां जालिम रहीं। उस योजना का क्या होगा जो करीब तीन दर्जन विशेष क्षेत्र यानी साडा बनाकर नियोजित करने की पहल समझी गई। क्या शहरी विकास की पाजेब पहनकर राजनीति ही नाचती रहेगी या भविष्य की जरूरतों को समझते हुए कठोर कदम उठाए जाएंगे। यह विडंबना है कि शहरीकरण को सही परिप्रेक्ष्य में लेने के  बजाय, हम ऐसा माहौल तैयार कर चुके हैं, जहां हिमाचली जनता अपनी लीक से हटकर कानून सम्मत फैसलों को अंगीकार करने की जहमत नहीं उठाती, बल्कि राजनीतिक समाधान से कानूनी शब्दावली ही पलट दी जाती है। बेशक सरकार ने बीस नए शहरी निकाय क्षेत्रों में निर्माण संबंधी अनुमति प्रदान करने की छूट दे दी, लेकिन भविष्य के शहरों की रखवाली कैसे होगी। प्रदेश की सबसे अधिक आबादी के शहरी क्षेत्र बीबीएन से लिपटीं समस्याओं का निराकरण करना हो, तो सारी व्यवस्था के मजमून बदलेंगे। पिछले दिनों बीबीएन की विकरालता में जब मुख्यमंत्री और राज्यपाल के काफिले फंसे, तो उसके अर्थ ढूंढने के बजाय दो अधिकारियों को तड़ीपार कर देने से कोई समाधान नहीं हुआ। यह आश्चर्य है कि चंडीगढ़ के इर्द-गिर्द ट्राई सिटी के महत्त्व में पंचकूला तथा मोहाली का विकास हो सकता है, तो इसी परिधि में बीबीएन तथा परवाणू क्यों समृद्ध नहीं हुए। सरकारी तौर पर शहरीकरण की हजामत के अनेक सबूत बीबीएन में तड़प रहे हैं, तो इसी तरह कमोबेश हर विकसित होते नगर की यह व्यथा है। परवाणू से शिमला, भुंतर से मनाली, मंडी से सुंदरनगर, कांगड़ा से धर्मशाला या पालमपुर की दिशा में शहरीकरण की अनेक मंजिलें दिखाई देती हैं, तो इन तमाम गतिविधियों के बीच पर्वतीय मॉडल है क्या। बेहतर होगा हम एनजीटी के फैसलों को भविष्य के पैमानों में देखें। अब पूरे हिमाचल को ग्राम एवं नगर योजना कानून के तहत लाकर आगे बढ़ना होगा, ताकि एक साथ पर्यावरण, पर्यटन तथा शहरीकरण की चुनौतियों का समाधान खोजते हुए ग्रामीण परिवेश को भी संरक्षण मिले। निर्माण अनुमति देना अगर सियासी सहूलियत की तरह प्रदर्शित होती गई, तो सारे पर्वतीय मानदंड टूटेंगे, अतः आवश्यकता के दूसरे पहलू में नगर नियोजन विभाग को मानवीय व शहरी विकास की जरूरतों का सही मायने में पहरेदार बनाना पड़ेगा। कानून के कार्यान्वयन में कम से कम आधा दर्जन विकास प्राधिकरणों के तहत, शहरी एवं ग्रामीण योजना प्रारूप को वांछित आधार देना होगा।
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( साभार  :-  एजेन्सी / संवाददाता  / अन्य न्यूज़ पोर्टल  )

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